• संस्कार विधि (Sanskar Vidhi)

    भारतीय संस्कृति में संस्कारों का विशेष महत्व है । संस्कार हमारे जीवन के आधार हैं । संस्कार का अर्थ होता है शुद्ध करना , साफ करना , चमकाना और भितरी रूप का प्रकाशित करना । हमारी दिनचर्या की भाँति हमारी जीवनचर्या भी निसमित है । जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त के मानव जीवन का गम्भीर अध्ययन करके महर्षि दयनन्द ने मनुष्य के पूर्ण विकास के लिए ऐसा विकास जिसमें शरीर , मन , आत्मा तीनों की उन्नति हो , जिन सुनहरे नियमों की रचना की है उन्हें हम अपनी जीवनचर्या के नियम कहते हैं । हमारे संस्कार भी इसी जीवनचर्या के प्रमुख अंग हैं । – आईए महर्षि दयानन्द कृत संस्कार विधि द्वारा सोलह संस्कारों की पूर्ण विधि जानें । अंग्रेजी में भी उपलब्ध ।

    The Samskāravidhi revived the practice of the Panchamahāyajnas , and the sixteen Samskāras . It represents the synthetic view of the rishis on the Samskāras . It is the authority on the Samskāras . It is not a manual only for the Purohitas . It is a guide book for all people of all classes . It is like the lighthouse in the ocean of life . It conveys the universal message of the Vedas and the rishis to build a better individual and a better world . Its message is for the brahmachari , the acharya , the grihasthi , the vānaprasthi , and the sanyasin , that is , for all classes of people . It is right for all people of all Varnas to perform the Garbhādhāna and other holy Samstāras sacraments prescribed by the Vedas . These sacraments sanctify the body and enhance purification here in this world , and in the hereafter too . -Manusmriti 2/1 . It is absolutely right for all the people to perform the Samskāras , because by their performance the Sharira ( body ) and the atman ( soul ) are refined , and Dharma , Artha , Kāma and Moksha are be attained and the children become more cultured and noble . – Maharishi SvamiDayanandSarasvati .

  • कर्मफल सिद्धांत – Karmphal Siddhant

    उपाध्याय जी जन्मजात दार्शनिक थे । दर्शन तथा सिद्धान्त सम्बन्धी अनेकों उच्चकोटि के ग्रन्थ उन्होंने लिखे । पाप , पुण्य , दुःख , सुख , मृत्यु , पुनर्जन्म , जीव व ब्रह्म का सम्बन्ध विषयक अनके प्रश्नों पर इस पुस्तक में युक्तियुक्त सप्रमाण प्रकाश डाला गया है । ‘ कर्म – फल – सिद्धान्त को बार बार पढ़ने को आपका मन करेगा । प्रश्नोत्तर शैली में अत्यन्त शुष्क विषय को उपाध्याय जी ने बहुत रोचक व सरल सुबोध बना दिया है । कर्म फल सिद्धान्त पर छोटी – बड़ी अनेक पुस्तकें हैं , परन्तु उपाध्याय जी की यह पुस्तक अपने विषय की अनुपम कृति | उपाध्याय जी ने स्वयं ही इसका उर्दू अनुवाद किया था । उपाध्याय जी की कौन सी दार्शनिक पुस्तक सर्वश्रेष्ठ है , यह निर्णय करना किसी भी विद्वान् के वश की बात नहीं है । बस यही कहकर सब गुणियों को सन्तोष करना चाहिए । कि अपने स्थान पर उनकी प्रत्येक पुस्तक सर्वश्रेष्ठ है । ज्ञान पिपासु पाठक , उपाध्याय जी के सदा ऋणी रहेंगे ।

  • ओंकार निर्णय – Omkar nirnaya By ShivShankar Sharma Kavyatirth

    ओंकार निर्णय नामक पुस्तक आध्यात्मिक स्वाध्याय के लिए अनूठी पुस्तक है । ‘ ओझर ‘ अथवा ‘ ओ ३ म् ‘ के अर्थ , महत्व और उपास्य स्वरूप को समझने के लिए इससे बढ़कर प्रमाण और तर्कयुक्त पुस्तक शायद ही कोई अन्य हो । विद्वान् लेखक ने इस पुस्तक में वेदों , ब्राह्मण ग्रन्थों , उपनिषदों , मनुस्मृति , गीता , व्याकरण आदि वैदिक साहित्य के प्रमाण देकर ‘ ओ ३ म ‘ के अर्थ और महत्व को तो प्रतिपादित किया ही है , साथ ही पुराणों और तन्त्र ग्रन्थों में वर्णित ओ ३ म् के महत्व को भी खोजकर उसको सप्रमाण प्रस्तुत कर दिया है ।

  • एकादशोपनिषद् – Ekadashopnishad

    इस पुस्तक में  जी ने प्रमुख 11 उपनिषदों का सरल हिंदी में सचित्र अनुवाद किया है जिससे सामान्य पाठक गण भी सरलता पूर्वक अध्ययन कर सकें वाह उपनिषदों के तत्वों को आत्मसात कर सकें। इस पुस्तक में एक एक शब्द का संस्कृत में हिंदी अनुवाद भी किया गया है ताकि किसी भी भ्रम की संभावना ना रहे जो भी कठिन टिप्पणी दी गई है उसको सरलता से समझाने का प्रयास किया गया है।

  • ऋषि दयानन्द के सर्वश्रेष्ठ प्रवचन – Rishi Dayanand Ke Sarvasreshth Pravachan

    अपने युग के अद्वितीय विद्वान् तथा धर्म संशोधक महर्षि दयानन्द सरस्वती ने स्वजीवन काल में सहस्रों व्याख्यान व प्रवचन दिये , किन्तु महाराष्ट्र की काशी पूर्ण नगरी में दिये गये उनके कतिपय व्याख्यानों के अतिरिक्त उनके अन्य भाषण व प्रवचन न तो लिपिबद्ध हो सके और न उनका विस्तृत विवरण उपलब्ध होता है । इस ग्रन्थ के अध्ययन से स्वामी दयानन्द की व्याख्यान शैली से पाठकों को रूबरू होने का अवसर मिलेगा , साथ ही उनके अपार वैदुष्य , परगामी शास्त्र ज्ञान , उन्कृष्ट तर्क कौशल , वाक्यातुर्य तथा प्रतिपादन कौशल से भी परिचित हो सकेंगे । अनेक ऐसे प्रश्न और प्रसंग जो अन्य ग्रन्थों में व्याख्यात नहीं किये जा सके उन्हे स्वामीजी ने इन व्याख्यानों में स्पष्ट किया है ।

    Edited by Dr. Bhawanilal Bhartiyaji , this is collection of 15 pravachan of Swami dayanand delivered at PUNE . Which also called UPDESH MANJARI

  • ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका – Rigvedaadibhasyabhumika

    चारों वेदों के भाष्य की भूमिका , स्वामी दयानन्द सरस्वती चारों वेदों का जो भाष्य रचना चाहते थे , उस भाष्य के आधारभूत 35 विषयों का इस भूमिका में निरूपण किया है । इसलिए ऋग्वेदादीभाष्यभूमिका को अच्छी प्रकार से पढ़े बिना स्वामी दयानन्द सरस्वती का वेद भाष्य यथावत् समझ में नहीं आ – सकता । पं . युधिष्ठर मीमांसक – वेद की उत्पत्ति , रचना , प्रामाण्य अप्रामाण्य वेदोक्त धर्म आदि अनेक विषयों पर इस ग्रन्थ में स्पष्ट विचार किया गया है । पूर्व के वेदभाष्यकारों के अनेक अनार्ष मतों का विवेचन करके सप्रमाण वैदिक आर्य सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है । वेद के सिद्धान्तों को समझने के लिए यह ग्रन्थ अपूर्व है । – श्री देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय महर्षि ने इस भूमिका में पहले इस प्रश्न का उत्तर दिया है कि वेद क्या हैं और वेदोत्पत्ति का अत्यन्त सूक्ष्म विषय , सारगर्भित रीति से , निरूपण करने के पश्चात् वेदमन्त्रों के प्रमाणों से वेदों के विषयों को दर्शाते हुए , वेदों के सच्चे महत्व का बोधन कराया है । वेदों को वे सूर्यवत् स्वतःप्रमाण और शेष समस्त ग्रन्थों को परतः प्रमाण ठहराते हैं । – पं . लेखराम महर्षि दयानन्द ने अपनी योगदृष्टि द्वारा वैदिक तत्त्वों को साक्षात् कर वेदभाष्यों के रचने का संकल्प किया । जिन नियमों और सिद्धान्तों के आधार वेदभाष्य करना चाहते थे , उनका विस्तृत वर्णन ऋग्वेदादीभाष्यभूमिका ग्रन्थ में किया गया है । प्रो . विश्वनाथ विद्यालंकार पर महर्षि अंग्रेजी में भी उपलब्ध ।

    Swami Dayananda’s supreme effort in the life was to give back to the world the VEDAS , the ancient treasure – house of Divine knowledge . There had been commentators and interpreters who had grossly misinterpreted the Vedas . So Dayananda’s task was two – fold , not only to interpret the Vedas in a proper and genuine manner but to remove their unholy ideas and misinterpretations . Dayananda’s Rigvedadi – Bhashya – Bhumika is a unique work in the field of Vedic Scholarship . Almost all vedic works and other scriptural and philosophical treatises in Sanskrit have been quoted in this work . It contains more than one thousand citations from all spheres of Sanskrit literature , including three hundred verses form the Vedas .

  • ऋग्वेद सम्पूर्ण (4 भाग) Rigveda Complete (4 Volumes) By: Swami Dayanand Saraswati

    मन्त्र , शब्दार्थ , भावार्थ तथा मन्त्रानुक्रमणिका सहित प्रस्तुत । मन्त्र भाग स्वामी जगदीश्वरानन्दजी द्वारा सम्पादित मूल वेद संहिताओं से लिया गया है । चारों वेदों में आकार की दृष्टि से ऋग्वेद सब से बड़ा है । यह दस मण्डलों , 1028 सूक्तों तथा 10589 मन्त्रों में समाहित है । दर्शन , धर्म , अध्यात्म शास्त्र , नीति एवम् आचार शास्त्र , लौकिक ज्ञान विज्ञान , मानव के हित में ऐसी कोई ज्ञान की शाखा या विधा नहीं है जिसकी चर्चा वेदों में न आई हो । ” संसार के पुस्तकालय में ऋग्वेद सबसे प्राचीन है , इस बात को सभी पाश्चात्य विद्वानों ने स्वीकार किया है । भारत की धार्मिक परम्परा चारों वेदों को परमात्मा का अनादि ज्ञान मानती है जो सृष्टि के आरम्भ में मानव जाति के हितार्थ ऋषियों के माध्यम से दिया गया था । ऋग्वेद का प्रकाश अग्नि ऋषि के हृदय में हुआ था । ऋग्वेद की महिमा का वर्णन करते हुए मैक्समूलर ने कहा- जब तक पृथिवी पर पर्वत और नदियाँ रहेंगी तब तक संसार के मनुष्यों में ऋग्वेद की कीर्ति का प्रचार रहेगा ।

    ऋग्वेद विज्ञानवेद है । इसमें तृण से लेकर ईश्वरपर्यन्त सब पदार्थों का विज्ञान भरा हुआ है । प्रकृति क्या है ? जीव क्या है ? जीव का उद्देश्य क्या है और उस लक्ष्य प्राप्ति के साधन क्या हैं ? ईश्वर का स्वरूप क्या है ? उसकी प्राप्ति क्यों आवश्यक है और वह किस प्रकार हो सकती है ? इत्यादि सभी बातों का वर्णन ऋग्वेद में मिलेगा । महर्षि दयानन्द ने ऋग्वेद का भाष्य करना प्रारम्भ किया था , परन्तु वह पूर्ण न हो सका । स्वामीजी सातवें मण्डल के 61 वें सूक्त के दूसरे मन्त्र तक ही भाष्य कर पाये । आगे का भाष्य उन्हीं की शैली में अन्य वैदिक विद्वानों ने पूर्ण किया । ऋग्वेद के दो ब्राह्मण हैं ‘ ऐतरेय ‘ और ‘ कौषीतकी ‘ । इसका उपवेद आयुर्वेद है ।

     Complete Rigveda Bhashya ( 10589 Hymns ) , Computerized for the first time , Accurate Matter , Clean and Charming Printing , Attractive Cover , Good Quality Paper , Hard Bound Binding , Beautiful Type Font , with Word Meaning and List of Mantras at the end Rigveda says- light the fire of life , ignite the cosmic Energy , and receive the Enlightenment of the Life Divine : Move together forward in unison , speak together , and with equal mind all in accord , know you all together as the sages of old , knowing and doing together , play their part in life and fulfil their duty according to Dharma . -Rg .

  • उपनिषदों की कथाएं ( Upnishadon ki kathayen )

    आर्य समाज में उपनिषदों को सदा ही आदर मिलता रहा है । ऋषि दयानंद ने अपने ग्रंथों में उपनिषदों के शतशः उद्धरण दिए हैं तथा अपने दार्शनिक मत की पुष्टि में उन्हें भूरीशः उद्धृत किया है । उपनिषत्कार प्रायः अपने सिद्धांतों को स्पष्ट करने के लिए विभिन्न आख्यानों और कथाओं का सहारा लेते हैं । इन आख्यानों और कथाओं के द्वारा अध्यात्म जैसे गूढ़ विषय को स्पष्ट , सरल तथा बोधगम्य बनाने का उपनिषद् निर्माता ऋषियों का यह प्रयास निश्चय ही श्लाघनीय था ।

    आवश्यक कथाओं की यह सुबोध व्याख्या उपनिषद्गत अध्यात्म में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए प्रस्तुत है ।

    The Upnishads are Vedanta , a book of knowledge in higher degree even than the VEDAS . In the present work , the author has selected the well known dialogues and parables from the Upnishads ; narrated and have tried to be as close to the original as possible , retaining the beauty of the original composition .

    Each phrase has something interesting and instructive . Each dialogue deals with some of the mysteries unfolded .

  • उपनिषद रहस्य- एकादशोपनिशद Upnishad Rahasya – Ekadashopnishad By: Mahatma Narayan Swami

    उपनिषद् शब्द का एक अर्थ ‘ रहस्य ‘ भी है । उपनिषद् अथवा ब्रह्म विद्या अत्यन्त गूढ़ होने के कारण साधारण विद्याओं की भाँति हस्तगत नहीं हो सकती , इन्हें ‘ रहस्य ‘ कहा जाता है । इन रहस्यों को उजागर करने वालों में महात्मा नारायण स्वामीजी का नाम उल्लेखनीय है । उपनिषदों में ब्रह्म और आत्मा की बात इतनी अच्छी प्रकार से समझाई गई है कि सामान्य बुद्धि वाले भी उसका विषय समझ लेते हैं । महात्मा नारायण स्वामीजी ने अनेक स्थानों पर सरल , सुबोध तथा रोचक कथाएँ प्रस्तुत कर इन्हें उपयोगी बना दिया है । वास्तव में उपनिषदों में विवेचित ब्रह्मविद्या का मूलाधार तो वेद ही हैं । इस सम्बन्ध में महर्षि दयानन्दजी कहते हैं- ” वेदों में पराविद्या न होती , तो ‘ केन ‘ आदि उपनिषदें कहाँ से आतीं ? ” आइए ग्यारह उपनिषदों के माध्यम से मानवीय भारतीय चिन्तन की एक झाँकी लें ।

    The word Upanishad means the setting down of the disciple near his teacher in a devoted manner to receive instruction about the Highest Reality which loosens all doubts and destroys all ignorance of the disciple. The Author translated these Upanishads according to the philosophy of Svami Dayanand Sarasvati. Authentic and Lucid Hindi translation all of Eleven Upanishads by a great vedic scholar and Mahatma Narain Swami, will clarify many doubts regarding the principles of the Upanishads and will show a new path to the admirers and readers of the Upanishads.

  • आर्य-पर्वपद्धति – Arya-Parva Paddhati By Pandit Bhavani Prasad

    पर्वो – त्यौहारों तथा महात्माओं , महापुरुषों के जन्मोत्सव , विजयोत्सव व धर्मोत्सव को मनाना हमारी परिपाटी है । आर्य शताब्दी सभा द्वारा स्वीकृत यह पर्व – त्यौहार पद्धतियाँ हमें पर्वों का शुद्ध व सत्यस्वरूप जानने में अत्यन्त सहायक सिद्ध होंगी । इस पुस्तक से मार्गदर्शन प्राप्त कर समस्त आर्यजगत में त्यौहार एक विधि से मनाए जाएँ , यही इसका उद्देश्य है ।

    वैदिक धर्म वैज्ञानिक धर्म है । श्रेष्ठ संस्कारवान् मानव का निर्माण करना वैदिक संस्कृति का मूलभूत उद्देश्य है । ऋषियों – मनीषियों ने मानव को सुसंस्कृत करने के लिए कुछ पर्व – पद्धतियाँ व कर्मकाण्ड – पद्धतियाँ बनाई । शिशु के गर्भ में आते ही आत्मा को अनेकानेक मलिनताओं से दूर रखने के लिए अर्थात् मृत्यु पर्यन्त आनन्दपूर्वक सुव्यवस्थित जीवन जीने के लिए इन पर्वो कर्मकाण्डों की व्यवस्था की गई है । हमारे पर्व व त्यौहार धर्म से घनिष्ठ सम्बन्ध रखते हैं , यही आर्य जाति के पर्वों की विशेषता है । पर्वो व त्यौहारों का उद्देश्य मनुष्य के आध्यात्मिक जीवन को साकार करना , धार्मिकता के भावों तथा आनन्द की वृद्धि करना है । वैदिक कर्मकाण्डों के प्रति श्रद्धा भाव जगाने के लिए बड़ी सरस तथा सरल शैली में इस पुस्तक की रचना की गई है । आइए लेखक द्वारा प्रस्तुत इस परिष्कृत परिपाटी का प्रचार करते हुए पर्वो के शुद्ध व सत्यस्वरूप को संसार के समक्ष प्रकट करें ।

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