• सत्यार्थ प्रकाश Satyarth Prakash By: Swami Dayanand Sarswati

    सन् 1925 में महर्षि दयानन्द सरस्वतीजी के जन्म को सौ वर्ष पूरे हो चुके थे । इस अवसर पर मथुरा में जन्मशताब्दी समारोह का विश्व स्तर पर आयोजन किया गया , जिसके प्रधान आर्य जगत् के प्रमुख विद्वान् ऋषिभक्त , योगी एवं नेतृत्व करने की असीम क्षमता से युक्त महात्मा नारायण स्वामी जी थे । इस समारोह में लाखों की संख्या में लोग मथुरा पहुंचे थे जो एक अविस्मरणीय आयोजन बन गया था । इस अवसर की महत्ता को समझकर श्री गोविन्दरामजी ने ‘ सत्यार्थप्रकाश ‘ को प्रकाशित कर सस्ते मूल्य पर प्रसारित करने का संकल्प किया । महर्षि दयानन्द की इस महत्वपूर्ण कृति को बिना किसी प्रक्षेप के मूल रूप में प्रकाशित किया जा रहा है । कम्प्यूटर कृत कम्पोजिंग , शुद्ध सामग्री , नयनाभिराम छपाई , उत्तम कागज एवं सुन्दर आवरण युक्त यह संस्करण आपको अवश्य पसन्द आएगा और आप इससे लाभान्वित होंगे ऐसी आशा है । अंग्रेजी में भी उपलब्ध ।

    Satyartha Prakasha is an exposition of Truth , Dharma and Revelation in the modern context . Swami Dayananda referred back to the permanent message of the Vedas and exhorted the Indians to renew and rebuild their life and culture in new forms which were relevant in the new age .

  • क्रिशिचयनिटी कृष्ण नीति है-Christianity Krishan-neeti hai (HINDI) PN Oak

    इस पुस्तक के शीर्षक ” क्रिशिचयनिटी ” कृष्ण – नीति है ‘ से पाठको में मिश्रित प्रतिक्रिया उत्पन्न होने की सम्भावना है । उनमें से अधिकांश सम्भवतया छलित एवं भ्रमित अनुभव करते हुए आश्चर्य करेंगे कि । नीति क्या हो सकती है और यह किस प्रकार क्रिशिचयनिटी की ओर अग्रसर हुई होगी।

    यह सामान्य मानव धारणा है । किसी भी नई पुस्तक को उठाने पर यह समझा जाता है कि इसमें कुछ नया कहा गया है । और जब वह पुस्तक वास्तव में कुछ तथा कहती है तो उसकी प्रतिक्रिया होती है- ” क्या हास्यास्पद कथन है , ऐसी बात हमने कभी सुनी ही नहीं । ” कहना होगा कि भले हो कोई उसे समझने का बहाना बना रहा हो , किन्तु वह अपने मन और बुद्धि से उससे तब ही सहमत होता है जबकि वह उसकी अपनी धारणाओं से मेल खाता हो । यहाँ पर यह सिद्धान्त लागू होता है कि यदि किसी को स्नान का भरपुर आनन्द लेना हो तो उसे पूर्णतया नग्म रूप में जल में प्रविष्ट होना होगा । इसी प्रकार यदि किसी नए सिद्धान्त को पूर्णतया समझता है तो उसे अपने मस्तिष्क को समस्त अवधारणाओं , अवरोधों , शंकाओं , पक्षपातों , पूर्व धारणाओं , अनुमानों एवं सम्भावनाओं से मुक्त करना होगा । ऐसी सर्व सामान्य धारणाओं में आजकल एक धारणा यह भी है कि ईसाइयत एक धर्म है , जिसकी स्थापना जीसस काइस्ट ने की थी । यह पुस्तक यह सिद्ध करने के लिए है कि ‘ जीसस ‘ नाम का कोई था ही नहीं , इसलिए कोई ईसाइयत भी नहीं हो सकती । यदि इस प्रकार की सम्भावना से आपको किसी प्रकार की कपकपी नहीं होती है तो तभी आप इस पुस्तक के पारदर्शी सिद्धान्तरूपी जल में अवगाहन का आनद उठा सकते हैं , जोकि गर्मागर्म साक्ष्यो और मनभावन तर्को से सुवासित किया गया है।

  • क्या अथर्ववेद में जादू टोना आदि है ? ( Kya Atharvaved mein jadoo tona aadi hai ? )

    जादू शब्द फारसी भाषा का है । वहाँ पर इसका अर्थ बाजीगरी के खेल तमाशे , अमानुषिक करिश्मे , वशीकरण तथा हिंसा , परघात आदि हैं । जादू शब्द वेद के ‘ यातु ‘ शब्द का अपभ्रंश है । ‘ यातु ‘ का अर्थ हिंसा है । यातयति वधकर्मा ( निघण्टु २।१ ९ ) । अथर्ववेद में उपर्युक्त किसी भी कार्य का वर्णन नहीं है । वस्तुतः यह प्रतिपादन करना अत्यन्त कठिन है कि अथर्ववेद में जादू – टोना , सम्मोहन , वशीकरण , मारण- उच्चाटन आदि नहीं है । इसके विपरीत यह कहना अति सरल है कि अथर्ववेद में इन सबका वर्णन है । इसका कारण यह है कि अथर्ववेद में मारण , सम्मोहन , वशीकरण आदि से सम्बन्धित अनेक मन्त्र हैं । इनके साथ ही कृत्या , अभिचार , मणिबन्धन आदि का प्रतिपादन भी अथर्ववेद में किया गया है , किन्तु इनका वह अर्थ नहीं जोकि आजकल समझा जाता है । अथर्ववेद में अन्य दृष्टि से इनका प्रतिपादन किया गया है । यहाँ पर अन्तर केवल दृष्टि है ।

    ऐसा हम आज प्रत्यक्षरूप में देखते हैं । आज भी अनेक व्यक्तियों को भूत – प्रेत अथवा ऊपरी हवा से ग्रसित समझकर ओझाओं द्वारा उनका भूत – प्रेत दूर करने का स्वांग किया जाता है । अनेक व्यक्ति हवा में हाथ हिलाकर कोई पदार्थ दर्शकों के सामने प्रस्तुत करके अथवा अन्य किसी प्रकार से कोई चमत्कारपूर्ण प्रदर्शन करके दर्शकों के सामने जादू अथवा सिद्धि प्राप्ति की बात करते हैं । ये सब अन्धविश्वास हैं तथा अवैज्ञानिक लोगों में ही अधिक प्रचलित हैं । इनका पर्दाफाश करने के लिए आजकल एक वैज्ञानिक अनुसन्धान समिति कार्य कर रही है जिसकी चर्चा प्राय : समाचार पत्रों में भी आती रहती है । इन लोगों का दावा है कि इस प्रकार के कार्यों में जादू जैसी कोई बात नहीं है , अपितु यह केवल हाथ की सफाई है । भूत – प्रेत तथा ऊपरी हवा के विषय में भी यही बात है । आज डॉक्टरी परीक्षणों के आधार पर यह भली – भाँति सिद्ध हो गया है कि अनेक मानसिक तथा शारीरिक रोगों से ग्रस्त रोगियों को ही अज्ञानवश भूत – प्रेतों आदि से ग्रसित समझ लिया जाता है । इसी प्रकार अथर्ववेद में भी इन सब बातों का वर्णन है , कृत्या , अभिचार आदि के नाम हैं , वशीकरण , सम्मोहन , मणिबन्धन भी है । अतः समझ लिया जाता है कि ये सब क्रियाएँ जादू – टोने से सम्बन्धित हैं तथा अथर्ववेद इनका प्रतिपादक है । यह केवल पूर्वाग्रह है ठीक उसी प्रकार जैसे कि मानसिक रोगी को भूत – प्रेत से ग्रस्त समझने का । इसीलिए मैंने कहा कि अथर्ववेद में जादू – टोने आदि का प्रतिपादन करना अतिसरल है

  • कर्मफल सिद्धांत – Karmphal Siddhant

    उपाध्याय जी जन्मजात दार्शनिक थे । दर्शन तथा सिद्धान्त सम्बन्धी अनेकों उच्चकोटि के ग्रन्थ उन्होंने लिखे । पाप , पुण्य , दुःख , सुख , मृत्यु , पुनर्जन्म , जीव व ब्रह्म का सम्बन्ध विषयक अनके प्रश्नों पर इस पुस्तक में युक्तियुक्त सप्रमाण प्रकाश डाला गया है । ‘ कर्म – फल – सिद्धान्त को बार बार पढ़ने को आपका मन करेगा । प्रश्नोत्तर शैली में अत्यन्त शुष्क विषय को उपाध्याय जी ने बहुत रोचक व सरल सुबोध बना दिया है । कर्म फल सिद्धान्त पर छोटी – बड़ी अनेक पुस्तकें हैं , परन्तु उपाध्याय जी की यह पुस्तक अपने विषय की अनुपम कृति | उपाध्याय जी ने स्वयं ही इसका उर्दू अनुवाद किया था । उपाध्याय जी की कौन सी दार्शनिक पुस्तक सर्वश्रेष्ठ है , यह निर्णय करना किसी भी विद्वान् के वश की बात नहीं है । बस यही कहकर सब गुणियों को सन्तोष करना चाहिए । कि अपने स्थान पर उनकी प्रत्येक पुस्तक सर्वश्रेष्ठ है । ज्ञान पिपासु पाठक , उपाध्याय जी के सदा ऋणी रहेंगे ।

  • ऋषि दयानंद प्रतिपादीत 8 गप्प तथा 8 सत्य – Rishi Dayanand Pratipadit 8 Gappe Tathe 8 Satya

    ऋषि दयानंद की दृष्टि में त्यागने योग्य आठ गप्प थीं ( 1 ) 18 पुराण ( 2 ) पाषाण पूजा , ( 3 ) शैव शाक्तादी संप्रदाय , ( 4 ) तंत्र ग्रंथ , ( 5 ) नशीली वस्तुसेवन , ( 6 ) व्यभिचार , ( 7 ) चोरी , ( 8 ) कपट , छल , अभिमान , मिथ्या भाषण आदि । और स्वीकार करने योग्य आठ सत्य हैं ( 1 ) वेदादि सत्यशास्त्र , ( 2 ) ब्रह्मचर्य पालन , ( 3 ) वेदोक्त वर्णाश्रम धर्म ( 4 ) पंच महायज्ञ , ( 5 ) शम , दम , 5 तप , आदि का सेवन , ( 6 ) विचार , विवके , वैराग्य ग्रहण , ( 7 ) काम , क्रोध , लोभ , मोह आदि का त्याग , ( 8 ) पंच क्लेशों से मुक्त होकर मोक्ष रूपी चरम लक्ष्य की प्राप्ति । ऋषि के इसी क्रांतिकारी चिंतन को डॉ . भवानीलाल भारतीय ने जो विस्तार दिया है वह पठनीय तथा अनुकरणीय है ।

    This is an authentic book from the writer of about sixty books on life and works of Swami Dayananda Saraswati – Dr . Bhawanilal Bhartiya . The readers will get acquainted with the revolutionary ideological thoughts of Swami Dayananda through this book . While on his journey for the cause of Religion , Swami Dayananda expounded Eight baseless notions to be relinquished and Eight Truths to be adopted for peaceful living . The author has elaborated on these thoughts .

  • उदेश्य सर्वस्व (Uddeshya sarvasva)-

    त्वदीयं वस्तु महर्षे ! तुभ्यमेव समर्पये । इस लोकोक्ति के आधार पर आर्यसमाज के 10 उद्देश्यों का संगति सूत्र लेकर लेखक इस लघु पुस्तिका में इन उद्देश्यों की विस्तृत व्याख्या कर रहे हैं ।

    इस लघु पुस्तिका के मुख्य पृष्ठ पर बने चित्र उपकार – तुला में संगति – सूत्र की एक झांकी लें । उपकार – तुला के दो पलड़े हैं – एक है व्यक्ति – पालड़ा , है दूसरा समाज – पालड़ा । व्यक्ति – पलड़े में प्रथम पांच उद्देश्य रखें हैं । समाज – पलड़े में पिछले चार उद्देश्य रखे हैं । पहले पांच उद्देश्यों का लक्ष्य व्यक्ति निर्माण है , जबकि पिछले चार उद्देश्यों का लक्ष्य समाज निर्माण है ।

    व्यक्ति और समाज के निर्माण और सामंजस्य में ही विश्व निर्माण और संसार का उपकार संभव है । पाठक वृन्द चित्र में इसकी झांकी लें और लघु पुस्तिका का अध्ययन मनन करें |

Cart

No products in the cart.

Filter Products